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Bihar Farmers: Farmer ID नहीं बनी तो 32 लाख से ज्यादा किसानों की बढ़ सकती है परेशानी, जमीन के रिकॉर्ड से जुड़ा मामला अहम

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Alam Ki Khabar | Bihar News | Patna News | Samastipur News | बिहार में 32 लाख से अधिक किसानों की फार्मर आईडी अभी नहीं बनी है। जमीन का रिकॉर्ड, आधार से जुड़ा मोबाइल और किसान की पहचान का सत्यापन अहम होने से पीएम किसान समेत दूसरी कृषि योजनाओं पर असर पड़ने की आशंका है।

पटना, 4 सितंबर। बिहार में किसानों की पहचान को डिजिटल व्यवस्था से जोड़ने की प्रक्रिया अब तेजी पकड़ रही है, लेकिन इसी के साथ बड़ी संख्या में किसानों की चिंता भी बढ़ गई है। राज्य में पहले चरण के तहत करीब 85.53 लाख किसानों की Farmer ID तैयार करने का लक्ष्य रखा गया है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार अब तक लगभग 53.45 लाख किसानों की Farmer ID तैयार हो सकी है। इस हिसाब से 32 लाख से ज्यादा किसान अभी इस प्रक्रिया को पूरा नहीं कर पाए हैं।

फार्मर रजिस्ट्री के जरिए किसानों की पहचान, जमीन और खेती से जुड़ी जानकारी को एक डिजिटल रिकॉर्ड में जोड़ने की तैयारी की जा रही है। सरकार का उद्देश्य योजनाओं का लाभ सही पात्र किसान तक पहुंचाना और फर्जी या दोहरे लाभार्थियों की पहचान करना है। लेकिन बिहार में जमीन के पुराने रिकॉर्ड और वास्तविक खेती करने वाले व्यक्ति के बीच अंतर इस प्रक्रिया में बड़ी बाधा बन रहा है।

जमीन अपने नाम नहीं होना सबसे बड़ी अड़चन

बिहार के ग्रामीण इलाकों में बड़ी संख्या में खेत अभी भी परिवार के बुजुर्ग सदस्यों के नाम दर्ज हैं। कई मामलों में पिता या दादा के नाम की जमीन पर बेटों और पोतों की ओर से वर्षों से खेती की जा रही है।

परिवार के स्तर पर जमीन का बंटवारा हो चुका है, लेकिन राजस्व रिकॉर्ड में नामांतरण नहीं हुआ है। ऐसी स्थिति में किसान खुद को वास्तविक रूप से जमीन का उपयोग करने वाला किसान मानता है, लेकिन सरकारी रिकॉर्ड में जमीन किसी दूसरे व्यक्ति के नाम दिखाई देती है।

यही स्थिति Farmer ID बनाने की प्रक्रिया में परेशानी पैदा कर रही है।

32 लाख से ज्यादा किसानों का मामला क्यों अहम?

पहले चरण में 85.53 लाख किसानों को डिजिटल किसान पहचान से जोड़ने का लक्ष्य है। इनमें से करीब 53.45 लाख किसानों की प्रक्रिया पूरी हो चुकी है। यानी लक्ष्य का एक बड़ा हिस्सा पूरा हुआ है, लेकिन अभी भी 32 लाख से ज्यादा किसानों को इस व्यवस्था में शामिल किया जाना बाकी है।

सरकारी योजनाओं में डिजिटल सत्यापन की भूमिका लगातार बढ़ रही है। ऐसे में किसान की पहचान और जमीन से जुड़े रिकॉर्ड को अपडेट रखना आने वाले समय में और जरूरी हो सकता है।

PM Kisan से आगे भी असर की चिंता

किसानों के बीच सबसे बड़ा सवाल पीएम किसान सम्मान निधि को लेकर है। फार्मर आईडी और किसान की पात्रता से जुड़े रिकॉर्ड को मजबूत करने की दिशा में काम होने के कारण किसान यह जानना चाहते हैं कि ID नहीं बनने पर उनकी किस्त पर क्या असर पड़ेगा।

हर ऐसे किसान की किस्त अपने आप बंद हो जाएगी, ऐसा मानना सही नहीं होगा। लेकिन भविष्य में योजनाओं के डिजिटल सत्यापन में किसान की पहचान, जमीन और पात्रता का रिकॉर्ड महत्वपूर्ण हो सकता है।

कृषि क्षेत्र से जुड़ी दूसरी योजनाओं में भी किसान की पहचान और भूमि रिकॉर्ड का महत्व बढ़ने की संभावना है। इनमें कृषि इनपुट, फसल बीमा, किसान क्रेडिट कार्ड और सरकारी सहायता से जुड़ी विभिन्न व्यवस्थाएं शामिल हैं।

बटाईदार किसानों के सामने अलग समस्या

बिहार में बटाई पर खेती करने वाले किसानों की संख्या भी कम नहीं है। ऐसे किसान किसी दूसरे व्यक्ति की जमीन पर खेती करते हैं। खेती की लागत और मेहनत वे करते हैं, लेकिन जमीन उनके नाम दर्ज नहीं होती।

यही कारण है कि किसान संगठनों की ओर से मांग उठाई जा रही है कि Farmer ID की व्यवस्था में वास्तविक खेती करने वाले बटाईदार किसानों को भी उचित स्थान दिया जाए।

अगर डिजिटल पहचान का आधार केवल जमीन का मालिकाना रिकॉर्ड बनता है, तो खेत में काम करने वाला वास्तविक किसान व्यवस्था से बाहर हो सकता है। यह स्थिति बिहार जैसे राज्य में विशेष चिंता का विषय है।

दूसरे राज्यों में काम करने वाले किसानों की भी मुश्किल

बिहार के हजारों-लाखों ग्रामीण परिवारों के सदस्य रोजगार के लिए दूसरे राज्यों में जाते हैं। खेती का मौसम आने पर वे गांव लौटते हैं, लेकिन साल के बड़े हिस्से में बाहर रहने के कारण सरकारी शिविरों या स्थानीय पंजीकरण केंद्रों पर पहुंचना मुश्किल हो सकता है।

Farmer ID के लिए मोबाइल और आधार से जुड़ी जानकारी तथा जमीन के रिकॉर्ड का सत्यापन भी जरूरी है। यदि इनमें किसी तरह की गड़बड़ी है तो किसान को उसे सुधारने के लिए संबंधित कार्यालय या केंद्र का चक्कर लगाना पड़ सकता है।

आधार-मोबाइल और जमाबंदी भी जांचें

किसानों को अपनी तरफ से कुछ जरूरी चीजों की जांच कर लेनी चाहिए। आधार में दर्ज जानकारी, आधार से जुड़ा मोबाइल नंबर, जमीन की जमाबंदी और किसान पंजीकरण में दर्ज नाम एक-दूसरे से मेल खाते हैं या नहीं, इसे देखना जरूरी है।

जमीन का नाम पुराने सदस्य के नाम होने की स्थिति में किसान को नामांतरण और जमाबंदी से संबंधित प्रक्रिया की जानकारी लेनी चाहिए। किसी भी तरह की गलती सामने आने पर उसे समय रहते ठीक कराने का प्रयास करना चाहिए।

सरकार के सामने दोहरी चुनौती

Farmer ID व्यवस्था सरकार के लिए डिजिटल कृषि व्यवस्था को मजबूत करने का महत्वपूर्ण कदम है। इससे किसान की पहचान और उसके कृषि रिकॉर्ड को एक जगह व्यवस्थित करने में मदद मिल सकती है।

लेकिन बिहार में जमीन से जुड़े पुराने पारिवारिक रिकॉर्ड, नामांतरण की स्थिति और बटाई पर खेती जैसी वास्तविक समस्याओं को देखते हुए केवल ऑनलाइन रिकॉर्ड तैयार करना पर्याप्त नहीं होगा।

जरूरत इस बात की है कि जिन किसानों की जमीन का रिकॉर्ड अपडेट नहीं है, उन्हें आसानी से सुधार की सुविधा मिले। साथ ही ऐसे किसानों के लिए भी स्पष्ट व्यवस्था हो जो जमीन के मालिक नहीं हैं, लेकिन वास्तव में खेती करते हैं।

किसानों के लिए जरूरी सावधानी

अगर किसान के नाम जमीन दर्ज नहीं है, तो उसे घबराने के बजाय सबसे पहले अपनी स्थिति की जानकारी संबंधित कृषि या राजस्व कार्यालय से लेनी चाहिए।

किसान यह भी जांचें कि—

आधार में नाम सही है या नहीं।

आधार से मोबाइल नंबर जुड़ा है या नहीं।

जमीन की जमाबंदी किसके नाम है।

किसान पंजीकरण में नाम सही दर्ज है या नहीं।

जमीन के रिकॉर्ड में कोई त्रुटि तो नहीं है।

Farmer Registry/ID की प्रक्रिया पूरी हुई है या नहीं।

समय रहते रिकॉर्ड ठीक कराने से भविष्य में सरकारी योजनाओं से जुड़े सत्यापन के दौरान परेशानी कम हो सकती है।

आंकड़ों में Farmer ID

विवरण

संख्या

पहले चरण का लक्ष्य

85.53 लाख किसान

Farmer ID तैयार

53.45 लाख किसान

अभी बाकी

32 लाख से अधिक किसान

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बड़ी तस्वीर

Farmer ID को लेकर बिहार में मौजूदा स्थिति यह बताती है कि डिजिटल किसान रजिस्ट्री का काम अभी पूरा नहीं हुआ है। 85.53 लाख के लक्ष्य के मुकाबले करीब 53.45 लाख किसानों की प्रक्रिया पूरी होना महत्वपूर्ण प्रगति है, लेकिन 32 लाख से अधिक किसानों का अभी बाहर रहना बड़ी चुनौती भी है।

सबसे महत्वपूर्ण सवाल उन किसानों का है जो वर्षों से खेती कर रहे हैं लेकिन जमीन उनके नाम दर्ज नहीं है। अगर ऐसे किसानों के लिए अलग समाधान नहीं निकाला गया, तो डिजिटल व्यवस्था का उद्देश्य पूरा करने के साथ एक नया व्यावहारिक संकट भी पैदा हो सकता है।

सरकार के लिए पारदर्शिता जरूरी है, लेकिन किसानों के लिए यह भी जरूरी है कि रिकॉर्ड की तकनीकी या पारिवारिक खामियों की वजह से वास्तविक लाभार्थी सरकारी सहायता से वंचित न हो।

EDITORIAL / COMMENTARY

बिहार में खेती की वास्तविक तस्वीर कागजों पर दर्ज जमीन से कहीं बड़ी है। खेत में काम करने वाला व्यक्ति कई बार जमीन का मालिक नहीं होता। कई परिवारों में जमीन पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ चुकी है, लेकिन सरकारी रिकॉर्ड आज भी पुराने नाम पर दर्ज है। इसलिए Farmer ID जैसी डिजिटल व्यवस्था लागू करते समय इन जमीनी परिस्थितियों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

डिजिटल रिकॉर्ड व्यवस्था पारदर्शिता के लिए जरूरी है। इससे सरकारी योजनाओं का पैसा सही लाभार्थी तक पहुंचाने और फर्जीवाड़े पर रोक लगाने में मदद मिल सकती है। लेकिन इसके साथ सुधार की आसान व्यवस्था भी उतनी ही जरूरी है।

विशेषकर बटाईदार किसानों के लिए सरकार को स्पष्ट नीति बनानी चाहिए। जो व्यक्ति वास्तव में खेत में फसल पैदा कर रहा है, उसे केवल इसलिए योजनाओं से बाहर नहीं होना चाहिए कि जमीन किसी दूसरे व्यक्ति के नाम दर्ज है।

Farmer ID किसानों के लिए सुविधा बने, बाधा नहीं—यही इस पूरी व्यवस्था की सबसे बड़ी सफलता होगी।

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